Argala Stotram lyrics in Hindi Download– अर्गला स्तोत्रम्

The Argala Stotram lyrics in Hindi is a potent chant dedicated to honoring the divine goddess Durga Devi. It is strongly advised for individuals experiencing setbacks in their business endeavors to recite the Argala Stotram daily, as it can help alleviate losses and enhance overall business performance. Additionally, there are numerous advantages associated with the regular recitation of the Argala Stotram. You can find theArgala Stotram lyrics in Hindi and incorporate it into your daily routine to seek the blessings of Durga Devi and experience profound benefits.

Argala Stotram lyrics in Hindi – अर्गला स्तोत्रम्

अस्यश्री अर्गला स्तोत्र मन्त्रस्य विष्णुः ऋषिः| अनुष्टुप्छन्दः| श्री महालक्षीर्देवता| मन्त्रोदिता देव्योबीजं|
नवार्णो मन्त्र शक्तिः| श्री सप्तशती मन्त्रस्तत्वं श्री जगदन्दा प्रीत्यर्थे सप्तशती पठां गत्वेन जपे विनियोगः‖

ध्यानं

ॐ बन्धूक कुसुमाभासां पञ्चमुण्डाधिवासिनीं|
स्फुरच्चन्द्रकलारत्न मुकुटां मुण्डमालिनीं‖
त्रिनेत्रां रक्त वसनां पीनोन्नत घटस्तनीं|
पुस्तकं चाक्षमालां च वरं चाभयकं क्रमात्‖
दधतीं संस्मरेन्नित्यमुत्तराम्नायमानितां|

अथवा
या चण्डी मधुकैटभादि दैत्यदलनी या माहिषोन्मूलिनी
या धूम्रेक्षन चण्डमुण्डमथनी या रक्त बीजाशनी|
शक्तिः शुम्भनिशुम्भदैत्यदलनी या सिद्धि दात्री परा
सा देवी नव कोटि मूर्ति सहिता मां पातु विश्वेश्वरी‖

ॐ नमश्चण्डिकायै

मार्कण्डेय उवाच

ॐ जयत्वं देवि चामुण्डे जय भूतापहारिणि|
जय सर्व गते देवि काल रात्रि नमोऽस्तुते || 1 ||


ॐ चंडिका देवी को नमस्कार है।

मधुकैठभविद्रावि विधात्रु वरदे नमः
ॐ जयन्ती मङ्गला काली भद्रकाली कपालिनी || 2 ||

मार्कण्डेय जी कहते हैं – जयन्ती, मंगला, काली, भद्रकाली, कपालिनी, दुर्गा, क्षमा, शिवा, धात्री, स्वाहा और स्वधा – इन नामों से प्रसिद्ध जगदम्बिके! तुम्हें मेरा नमस्कार हो। देवि चामुण्डे! तुम्हारी जय हो। सम्पूर्ण प्राणियों की पीड़ा हरने वाली देवि! तुम्हारी जय हो। सब में व्याप्त रहने वाली देवि! तुम्हारी जय हो। कालरात्रि! तुम्हें नमस्कार हो।

दुर्गा शिवा क्षमा धात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तुते
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि || 3 ||

महिषासुर निर्नाशि भक्तानां सुखदे नमः|
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि || 4 ||

मधु और कैटभ को मारने वाली तथा ब्रह्माजी को वरदान देने वाली देवि! तुम्हे नमस्कार है। तुम मुझे रूप (आत्मस्वरूप का ज्ञान) दो, जय (मोह पर विजय) दो, यश (मोह-विजय और ज्ञान-प्राप्तिरूप यश) दो और काम-क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो।। महिषासुर का नाश करने वाली तथा भक्तों को सुख देने वाली देवि! तुम्हें नमस्कार है। तुम रूप दो, जय दो, यश दो और काम-क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो

धूम्रनेत्र वधे देवि धर्म कामार्थ दायिनि|
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि || 5 ||

रक्त बीज वधे देवि चण्ड मुण्ड विनाशिनि |
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि || 6 ||


रक्तबीज का वध और चण्ड-मुण्ड का विनाश करने वाली देवि! तुम रूप दो, जय दो, यश दो और काम-क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो ।। शुम्भ और निशुम्भ तथा धूम्रलोचन का मर्दन करने वाली देवि! तुम रूप दो, जय दो, यश दो और काम-क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो

निशुम्भशुम्भ निर्नाशि त्रैलोक्य शुभदे नमः
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि || 7 ||

वन्दि ताङ्घ्रियुगे देवि सर्वसौभाग्य दायिनि|
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि || 8 ||


सबके द्वारा वन्दित युगल चरणों वाली तथा सम्पूर्ण सौभग्य प्रदान करने वाली देवि! तुम रूप दो, जय दो, यश दो और काम-क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो ।। देवि! तुम्हारे रूप और चरित्र अचिन्त्य हैं। तुम समस्त शत्रुओं का नाश करने वाली हो। तुम रूप दो, जय दो, यश दो और काम-क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो ।

अचिन्त्य रूप चरिते सर्व शतृ विनाशिनि|
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि || 9 ||

नतेभ्यः सर्वदा भक्त्या चापर्णे दुरितापहे|
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि || 10 ||


पापों को दूर करने वाली चण्डिके! जो भक्तिपूर्वक तुम्हारे चरणों में सर्वदा (हमेशा) मस्तक झुकाते हैं, उन्हें रूप दो, जय दो, यश दो और काम-क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो ।। रोगों का नाश करने वाली चण्डिके! जो भक्तिपूर्वक तुम्हारी स्तुति करते हैं, उन्हें तुम रूप दो, जय दो, यश दो और काम-क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो ।

स्तुवद्भ्योभक्तिपूर्वं त्वां चण्डिके व्याधि नाशिनि
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि || 11 ||

चण्डिके सततं युद्धे जयन्ती पापनाशिनि|
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि || 12 ||


चण्डिके! इस संसार में जो भक्तिपूर्वक तुम्हारी पूजा करते हैं उन्हें रूप दो, जय दो, यश दो और काम-क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो ।। मुझे सौभाग्य और आरोग्य (स्वास्थ्य) दो। परम सुख दो, रूप दो, जय दो, यश दो और काम-क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो ।

देहि सौभाग्यमारोग्यं देहि देवी परं सुखं|
रूपं धेहि जयं देहि यशो धेहि द्विषो जहि || 13 ||

विधेहि देवि कल्याणं विधेहि विपुलां श्रियं|
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि || 14 ||

जो मुहसे द्वेष करते हों, उनका नाश और मेरे बल की वृद्धि करो। रूप दो, जय दो, यश दो और काम-क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो ।। देवि! मेरा कल्याण करो। मुझे उत्तम संपत्ति प्रदान करो। रूप दो, जय दो, यश दो और काम-क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो ।

विधेहि द्विषतां नाशं विधेहि बलमुच्चकैः|
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि || 15 ||

सुरासुरशिरो रत्न निघृष्टचरणेऽम्बिके|
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि || 16 ||


अम्बिके! देवता और असुर दोनों ही अपने माथे के मुकुट की मणियों को तुम्हारे चरणों पर घिसते हैं तुम रूप दो, जय दो, यश दो और काम-क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो ।। तुम अपने भक्तजन को विद्वान, यशस्वी, और लक्ष्मीवान बनाओ तथा रूप दो, जय दो, यश दो और काम-क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो ।

विध्यावन्तं यशस्वन्तं लक्ष्मीवन्तञ्च मां कुरु|
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि || 17 ||

देवि प्रचण्ड दोर्दण्ड दैत्य दर्प निषूदिनि|
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि || 18 ||


प्रचंड दैत्यों के दर्प का दलन करने वाली चण्डिके! मुझ शरणागत को रूप दो, जय दो, यश दो और काम-क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो ।। चतुर्भुज ब्रह्मा जी के द्वारा प्रशंसित चार भुजाधारिणी परमेश्वरि! तुम रूप दो, जय दो, यश दो और काम-क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो ।

प्रचण्ड दैत्यदर्पघ्ने चण्डिके प्रणतायमे|
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि || 19 ||

चतुर्भुजे चतुर्वक्त्र संस्तुते परमेश्वरि|
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि || 20 ||

देवि अम्बिके! भगवान् विष्णु नित्य-निरंतर भक्तिपूर्वक तुम्हारी स्तुति करते रहते हैं। तुम रूप दो, जय दो, यश दो और काम-क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो ।। हिमालय-कन्या पार्वती के पति महादेवजी के द्वारा होने वाली परमेश्वरि! तुम रूप दो, जय दो, यश दो और काम-क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो ।

कृष्णेन संस्तुते देवि शश्वद्भक्त्या सदाम्बिके|
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि || 21 ||

हिमाचलसुतानाथसंस्तुते परमेश्वरि|
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि || 22 ||

शचीपति इंद्र के द्वारा सद्भाव से पूजित होने वाल परमेश्वरि! तुम रूप दो, जय दो, यश दो और काम-क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो ।। प्रचंड भुजदण्डों वाले दैत्यों का घमंड चूर करने वाली देवि! तुम रूप दो, जय दो, यश दो और काम-क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो ।

इन्द्राणी पतिसद्भाव पूजिते परमेश्वरि|
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि || 23 ||

देवि भक्तजनोद्दाम दत्तानन्दोदयेऽम्बिके|
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि || 24 ||


देवि! अम्बिके तुम अपने भक्तजनों को सदा असीम आनंद प्रदान करती हो। मुझे रूप दो, जय दो, यश दो और काम-क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो ।। मन की इच्छा के अनुसार चलने वाली मनोहर पत्नी प्रदान करो, जो दुर्गम संसार से तारने वाली तथा उत्तम कुल में जन्मी हो।

भार्यां मनोरमां देहि मनोवृत्तानुसारिणीं|
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि || 25 ||

तारिणीं दुर्ग संसार सागर स्याचलोद्बवे|
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि || 26 ||

इदंस्तोत्रं पठित्वा तु महास्तोत्रं पठेन्नरः|
सप्तशतीं समाराध्य वरमाप्नोति दुर्लभं || 27 ||

जो मनुष्य इस स्तोत्र का पाठ करके सप्तशती रूपी महास्तोत्र का पाठ करता है, वह सप्तशती की जप-संख्या से मिलने वाले श्रेष्ठ फल को प्राप्त होता है। साथ ही वह प्रचुर संपत्ति भी प्राप्त कर लेता है।

|| इति श्री अर्गला स्तोत्रम् पूर्ण ||

Argala Stotram Benefits – अर्गला स्तोत्रम् लाभ

व्यावसायिक समृद्धि: अर्गला स्तोत्रम का जाप करने से उन लोगों को मदद मिल सकती है जो अपने व्यवसाय में वित्तीय असफलताओं का सामना कर रहे हैं। ऐसा माना जाता है कि यह सकारात्मक ऊर्जा को आकर्षित करता है और व्यावसायिक प्रदर्शन में सुधार करता है, जिससे अंततः अधिक वित्तीय सफलता मिलती है।

सुरक्षा: मंत्र एक शक्तिशाली सुरक्षा कवच के रूप में कार्य करता है, जो व्यक्तियों को नकारात्मक प्रभावों से बचाता है और सुरक्षा की भावना को बढ़ावा देता है। ऐसा माना जाता है कि यह नुकसान और दुर्भाग्य के खिलाफ बाधा उत्पन्न करता है।

भावनात्मक शक्ति: अर्गला स्तोत्रम का नियमित पाठ आंतरिक शक्ति और भावनात्मक स्थिरता प्रदान कर सकता है। ऐसा माना जाता है कि यह व्यक्तियों को तनाव, चिंता और जीवन की चुनौतियों से अधिक प्रभावी ढंग से निपटने में मदद करता है।

आध्यात्मिक विकास: मंत्र आध्यात्मिक विकास और आत्म-प्राप्ति में सहायता कर सकता है। ऐसा कहा जाता है कि यह साधक को उच्च आध्यात्मिक क्षेत्रों से जोड़ता है और देवी दुर्गा के प्रति उनकी भक्ति को गहरा करता है।

Argala stotram pdf

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